उत्तम मार्दव धर्म पर प्रवचन
अहंकारी फूल तो सकता है फल नहीं सकता।
मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 17 सितंबर। जैन धर्म के दस लक्षण धर्म पर्व के द्वितीय दिन उत्तम मार्दव धर्म पर मंगल उपदेश देते हुए मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने कहा अहंकारी व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता। उसे एक दिन निश्चित ही अपमानित होना पड़ेगा। आपने कहा अहंकार में सब गया धन वैभव और वंश, न मानो तो देख लो रावण, कौरव कंस। मुनिराज ने उदाहरण देते हुए समझाया एक विद्वान पंडित जी थे उनसे जो भी शास्त्रार्थ में हार जाता था उसे जल समाधि लेनी पड़ती थी। उनके आश्रम में अनेकों विद्वान हार गए और जल समाधि लेकर मर गए। एक पंडित जी जो उनसे शास्रार्थ में हार गए थे उनकी जल समाधि के बाद उनके चार वर्षीय बेटे ने संकल्प लिया कि मैं इन्हें शास्त्रार्थ में हरा कर रहूंगा और उसने उन्हें शास्त्रार्थ में हरा दिया उस विद्वान का नाम था अष्टांग बक्र, उसने उन विद्वान पंडित जी को जल समाधि न देकर उन्हें अपने अहंकार का स्मरण कराया और जीवन दान देकर उन्हें ही अपना गुरु बनाया और उनसे कहा कि अगर आप अहंकार में सैकड़ो विद्वानों को जल समाधि नहीं देते तो आज सैकड़ो विद्वान होते उनसे सब भी को ज्ञान अर्जन का अवसर मिलता। आपने कहा रावण विद्वान था यह बात सुनने में अच्छी लगती है जबकि एक विद्वान रावण हो सकता है यह बात सुनने में अच्छी नहीं लगती है। आगे कहा पाप से गिरना घ्रणा करो, पापी से नहीं, वह वक्त भी गुजर गया यह वक्त भी गुजर जाएगा। प्रवचन के समापन में मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने स्वरचित कविता सुनाई शीर्षक था अपने आप को भी कभी झांक कर देखो।
दस लक्षण पर्व के द्वितीय दिन उत्तम मार्दव धर्म के दिन प्रातः काल से पूजन अभिषेक शांति धारा हुई दोपहर में कक्षाएं चली। दोपहर में प्रतिदिन जैन ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र की दस गाथाएं 10 नन्हे मुन्ने बच्चे कंठस्थ कर सुना रहे हैं। रात्रि में सामूहिक आरती भक्ति के बाद श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर से पधारे अनिकेत शास्त्री जी के मंगल प्रवचन होते हैं।
