पौधे के साथ पंख बो दिया है, संभव है कि डाली पर चहचहाहट गूंज उठे
!
डॉक्टर की डायरी: डॉ. शरद ठाकर
डॉक्टर अपने व्यवसाय में से आनंद प्राप्त नहीं कर सकता। वह धन, यश, कामना, संतोष, मरीजों के आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है, लेकिन आनंद पाने के लिए उसे अपने व्यवसाय के बाहर निकलना पड़ता है। अपनी प्रतिभा के अनुसार कोई शौक विकसित करना पड़ता है। जैसे कि लेखन, फोटोग्राफी, चित्रकला, गीत-संगीत, अभिनय या अन्य कोई प्रवृत्ति।" ऐसा एक जाने-माने चिकित्सक-चिंतक ने कहा है।
डीसा में प्रैक्टिस करने वाले गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. दर्शन पवार ने वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी को अपनी पसंद का कलश बनाया। लेबर रूम में नवजात शिशुओं को जन्म करवाकर जब उन्हें फुरसत मिलती, तब वे अपनी गाड़ी में कैमरा लेकर अपना शौक पूरा करने के लिए जवाई(Jawai) निकल पड़ते। डीसा से दो घंटे की दूरी पर राजस्थान का जवाई स्टेट आया हुआ है। महाराणा प्रताप के वंशज राजा बलजीतसिंहजी के साथ उनका परिचय हो गया। जवाई के जंगलों में घूमता उनका कैमरा तेंदुए (Leopard) को शूट करने के लिए तरसता रहता था।
डॉ. दर्शन द्वारा खींची गई तेंदुओं की तस्वीरों को देखकर कोई मान ही नहीं सकता कि यह इंसान doctor व्यवसाय में है। जवाई स्टेट के प्रशासनिक अधिकारी गफ्फारभाई और इरफानभाई सगे भाई हैं। राजवी बलजीतसिंहजी की सूचना से ये दोनों डॉ. दर्शन को तेंदुआ दिखाने में मदद करते। कई सालों तक साथ रहने के कारण दोनों भाइयों की डॉक्टर के साथ गहरी दोस्ती हो गई थी। वे दोनों डॉ. दर्शन को केवल एक फोटोग्राफर ही समझते थे।
एक दिन गफ्फार भाई ने कहीं से जानकारी पाई। उस जानकारी की पुष्टि (Confirmation) के लिए उन्होंने दर्शन से पूछा: "भाई, क्या आप डॉक्टर हो?"
दर्शन ने कहा, "हाँ, मैं डॉक्टर हूँ।"
गफ्फारभाई ने आशा के तंतु को पकड़ लिया, "तो मेरे भाई इरफान की बीवी का केस सॉल्व कर दो ना साहब।"
इरफान की बेगम हीनाबानू का केस क्या था? बारह साल पहले उन्हें एक बेटा हुआ था, उसके बाद दस बार वह प्रेग्नेंट हुई थी और हर बार बच्चा या तो अधूरे महीने में जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता या फिर डेढ़-दो महीने में एबॉर्शन (गर्भपात) हो जाता। हीना-इरफान अब दूसरे बच्चे के लिए तरस रहे थे।
डॉ. दर्शन ने कैमरे के लेंस से हटकर झाड़ी में कुछ हलचल देखी। एक तेंदुए का बच्चा बड़े से लेंस में कैद हो गया। उन्होंने अपने कैमरे का शटर बंद करके इरफान के भविष्य के बच्चे पर ध्यान केंद्रित किया, "पुरानी सब फाइलें लेकर डीसा आ जाओ, मैं कोशिश करूँगा।"
प्रथम मुलाकात में पूछताछ करने पर पता चला कि हीना को डेढ़ महीने की प्रेगनेंसी रुकी हुई थी। डॉ. दर्शन ने समझाया, "अभी बहुत सारे टेस्ट कराने का समय नहीं है। मैं इलाज शुरू करता हूँ । चौथा महीने की प्रेगनेंसी पूरी होगी तब गर्भाशय के मुख पर टांका लगाना पड़ेगा। यदि सब कुछ अच्छा रहा तो इस बार महीने पूरे होने के बाद ही बच्चा बाहर आएगा। मेरे संपर्क में रहना। तुम्हें बार-बार मेरे पास आने की जरूरत नहीं, तुम्हारे शहर में जो गायनेकोलॉजिस्ट हैं उन्हें नियमित दिखाते रहना।"
यह सुनकर इरफान का चेहरा उतर गया। "साहब, उस लेडी डॉक्टर के अस्पताल में ही हमारे दस-दस बार केस फेल हुए हैं। उनका स्वभाव भी बहुत चिड़चिड़ा है।"
दूसरा कोई रास्ता नहीं था। राजस्थान के छोटे शहरों में मेडिकल सुविधाएं गुजरात जैसी अच्छी नहीं होती थीं। जहाँ एक ही डॉक्टर हो, वहीं से इलाज लेना पड़ता था।
हीना ने जब साढ़े तीन मास पूरे किए, उस समय डॉ. दर्शन अपने नई अस्पताल में शिफ्ट होने में व्यस्त थे। वे टांका लगाने की बात भूल गए। फिर तो चौथा, पांचवा, छठा महीना भी बीत गया। सब कुछ ठीक चल रहा था इसलिए टांका लगाने की जरूरत नहीं रही।
उत्तरायण का दिन था। अचानक हीना को प्रसव पीड़ा उठी। पूरे महीने होने में अभी बहुत समय बाकी था। उस समय जो बच्चा जन्म लेता, वह बचता नहीं। दो घंटे का सफर तय करके प्रसूता डीसा पहुँचे, इतना जोखिम नहीं उठाया जा सकता था। डॉ. दर्शन ने सलाह दी, "तुम तत्काल अपनी उसी लेडी डॉक्टर के पास पहुँच जाओ। वह चेकअप करेगी तो मैं फोन पर उनसे बात कर लूँगा।"
लेडी डॉक्टर ने हीना की जांच करके अस्पताल में भर्ती कर लिया। जब डॉ. दर्शन ने फोन पर पूछा तो उन्होंने गुस्से में जवाब दिया, "मैं तो इन लोगों को दस साल से जानती हूँ। अभी इसके गर्भाशय का मुख 50% जितना खुल चुका है। दर्द बढ़ रहा है। दो-तीन घंटे में डिलीवरी हो जाएगी। यहाँ नियोनेटल केयर की व्यवस्था है। बच्चा बच जाए उसके लिए हम प्रयास करेंगे।"
"मैडम, इससे पहले इसी दवाखाने में इन्होंने दस-दस बार अपने बच्चों को खोया है। मेहरबानी करके उन्हें प्री-मैच्योर डिलीवरी रोकने का ट्रीटमेंट शुरू कर दीजिए। जरूरत पड़ी तो हम वहाँ आ जाएंगे।" डॉ. दर्शन ने विनती की।
"तुम्हें यहाँ आने की जरूरत नहीं।" फोन काट दिया गया। मैडम नाराज थीं। इरफान घबरा गया। डॉ. दर्शन ने कहा, "वहीं के मेडिकल स्टोर में जाओ और मैं जो कहूँ वह टैबलेट्स और इंजेक्शन खरीद कर हीना को देना शुरू करो। अगर एक महँगा इंजेक्शन मिल जाए तो काम बन जाए, वरना पता नहीं क्या होगा।"
गोलियाँ तो शुरू कर दी गईं। गफ्फार और इरफान पचास हजार रुपये का वह एक इंजेक्शन लाने के लिए दौड़-धूप करने लगे। कहीं से नहीं मिला। अंत में डॉ. दर्शन ने अपनी जान-पहचान का उपयोग करके आधी रात को होलसेल एजेंसी खुलवाई। इंजेक्शन प्राप्त किया और हीना तक पहुँचाया। रात पूरी हुई। सुबह जब डॉक्टर पेशेंट को देखने पहुँचीं, तो लेबर पेन शांत हुआ देखकर वे हक्की-बक्की रह गईं।
गफ्फार भाई ने इरफान से कहा, "यह इंजेक्शन अच्छा रहा भाई। डीसा के डॉ. दर्शन ने..."
यह सुनते ही लेडी डॉक्टर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने डॉ. दर्शन को फोन पर धमकी दी। "एक डॉक्टर के अस्पताल में उसकी जानकारी के बिना, उसकी सहमति के बिना अगर कोई बाहर का डॉक्टर किसी मरीज के ट्रीटमेंट में हस्तक्षेप करता है तो यह कानूनी अपराध है। मैं तुम्हें जेल भिजवा दूंगी।"
इरफान ने यह धमकी सुनी, वह तुरंत राजा साहब के पास दौड़ गया। राजा साहब ने तत्काल मंत्रालय के स्वास्थ्य मंत्री से बात की। महिला विधायक अस्पताल पहुँचीं और लेडी डॉक्टर को शांत किया
चार दिन अस्पताल में बिताकर हीना घर गई। पूर्ण आराम और दवाओं के सहारे शेष हफ्ते गुजर गए। पूरे महीने हुए तो इरफान हीना को लेकर डीसा डॉ. दर्शन के पास पहुँचे।
गर्भावस्था के महीने पूरे होने तक रुकना जोखिम भरा था। शुभ समय देखकर 'प्लान्ड सिजेरियन ऑपरेशन' किया गया। नन्हे शिशु को तंदुरुस्त हीना के हाथों में सौंपते समय डॉ. दर्शन ने सावधानी की चेतावनी दी, "जंग अभी खत्म नहीं हुई है। तुम्हारा ब्लड ग्रुप 'पॉजिटिव' है, हीना का 'नेगेटिव' है। नवजात बच्चे का ब्लड ग्रुप यदि 'पॉजिटिव' होगा तो...!"
और वही आशंका सच साबित हुई। बच्चे का ब्लड ग्रुप 'पॉजिटिव' था। चार-पांच घंटे में उसका सीरम बिलीरुबिन (पीलिया) बढ़ गया। डीसा के अनुभवी पीडियाट्रिशियन डॉ. सुनील आचार्य दौड़े आए। उन्होंने सलाह दी: "बच्चे का एक्सचेंज ब्लड ट्रांसफ्यूजन करना पड़ेगा। इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।"
खून बदलने की यह प्रक्रिया धीमी, लंबी, जटिल और जोखिम भरी थी। जो जरूरी था वह सब किया गया। बड़े शहरों जैसी सुविधा डीसा जैसे छोटे शहर में उपलब्ध कराई गई। जो अपनापन, प्रेम और मेहनत वहाँ के डॉक्टरों ने की, उसने मेट्रो-सिटी के स्तर को भी पीछे छोड़ दिया। बच्चा बच गया।
डॉ. दर्शन ने एक भी रुपया बिल में नहीं लिया। उन्होंने कहा: "इरफान, मुझे फोटोग्राफी का पागलपन की हद तक शौक है। भारत और विदेशों में भटक कर मैंने तेंदुए, चीता, पक्षी और मगरमच्छ की तीन लाख से भी ज्यादा तस्वीरें खींची हैं। उनमें से कई तस्वीरें लेने मे आपने मेरी बहुत मदद की है। ये एहसान तो में नहीं चुका सकता ले, यह जीता जागता बाघ का बच्चा तुझे सौंप रहा हूँ।"
रिपोटर चंद्रकांत सी पूजारी की एक रिपोर्ट गुजरात से
