सम्यक दृष्टि का पुण्य नियम से मोक्ष का कारण है।
श्रमण धारा प्रवचन माला में मुनि श्री के मंगल प्रवचन।
राघौगढ़ 23 जुलाई। दिगंबर जैन आचार्य संत शिरोमणि विद्यासागर जी महाराज के परम परम प्रभावक सुयोग्य शिष्य बुंदेली महाकवि मुनि श्रवण सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन करते हुए कहा जब तक मैं भगवान नहीं बन जाता व्यवहार नहीं छोड़ सकता। मगर व्यवहार हमारा लक्ष्य नहीं है। पुण्य हमें प्रतिफल चाहिए। पुण्य को सोने की बेड़ी कहा है। हमें यह समझना होगा कि पुण्य कब उपादेय है एवं कब हेय है ।आपने कहा जब तक मोक्ष की इच्छा नहीं होगी तब तक मोक्ष नहीं होगा। जब तक पंच परमेष्ठी का अवलंबन नहीं लेंगे मोक्ष नहीं होगा। जब तक दीक्षा नहीं होगी भगवान नहीं बन सकते। सम्यक दृष्टि का पुण्य नियम से मोक्ष का कारण है। ब्रह्मांड का जैसा स्वरूप है वैसा मानना सम्यक दर्शन है। मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने सम्यक दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा माता को माता मानना सम्यक दर्शन है। दूसरी ओर मौसी को माता मानना मिथ्या दर्शन है
धर्म सभा का संचालन कर रहे विकास कुमार जैन ने उल्लेख किया मुनि श्रमण सागर जी महाराज एवं मुनि ओंकार सागर जी का इस वर्ष का चातुर्मास धर्मनगरी राघौगढ़ में होने जा रहा है गत 20 जुलाई से महाराज के प्रवचन श्रमण धारा प्रवचन माला पर निरंतर चल रहे हैं साधार्मी पुरुष एवं महिलाएं महाराज जी के प्रवचन सुनकर धर्म लाभ ले रहे हैं।
