उत्तम शौच धर्म पर मंगल प्रवचन
वक्त बदलने में वक्त लग सकता है, व्यक्तित्व बदलने में वक्त नहीं लगता। मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 19 सितंबर। जैन समाज के दस लक्षण पर्व के अंतर्गत चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की व्याख्या करते हुए बुंदेली महाकवि, ओजस्वी वक्ता, महान तपस्वी मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन करते हुए कहा शरीर की बाहरी शुद्धि के साथ-साथ मन में भरे हुए विकारों की शुद्धि करना ही उत्तम शौच धर्म है। आपने दस लक्षण पूजन की पंक्तियों को सुनाते हुए कहा "लोभ पाप का बाप बखाना" इसका आशय यह है कि लोभ सब पापों में बड़ा है। मुनिराज ने उदाहरण देते हुए कहा एक पंडित जी दस लक्षण पर्व पर मंगल प्रवचन कर रहे थे। समीप ही की कॉलोनी में रहने वाली एक गणिका अपने मकान के छत पर बाल सुखा रही थी। उसे प्रवचनों से इतना परिवर्तन आया कि उसने यह निकृष्ट कार्य छोड़कर पंडित जी की शिष्या बनने का निर्णय किया। उस गणिका ने पंडित जी परीक्षा लेने धीरे-धीरे स्वर्ण मुद्राएं देकर पहले कॉलोनी में बुलाया, फिर उनकी गली में बुलाया, फिर अपने घर पर बुलाया, घर पर भोजन करने भी बुलाया। भोजन बनाने वाले दूसरे थे। अंत में गणिका ने स्वर्ण मुद्राएं और ज्यादा देकर पंडित जी को एक घूंट पानी उसके हाथ से पीने का आग्रह किया। स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में पंडित जी ने गणिका के हाथ से जल पिया जैसे ही पंडित जी ने गणिका के हाथ से जल पिया गणिका ने उनके गाल पर जोर से तमाचा मारा और कहा आप जो प्रवचन दे रहे हैं दूसरों को दिखाने के लिए और लोभ के चक्कर में आप सब भूल गये हैं। आप सच्चे गुरू नहीं हो सकते। आप सबसे बड़े लोभी हैं। मुनिराज ने कहा पहले हमारे अंदर स्वच्छता आएगी तब ही हम सत्याचरण कर सकेंगे। इसीलिए आचार्यों ने दस धर्म में पहले उत्तम शौच धर्म एवं इसके बाद उत्तम सत्य धर्म का वर्णन किया है। आपने कहा दुनिया में ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसे क्षमा नहीं किया जा सके। आपने आचार्य विद्यासागर जी महाराज के कथन का उल्लेख करते हुए कहा आचार्य जी अपराधी को मृत्युदंड दिए जाने के पक्ष में नहीं थे। अपराधी को मृत्यु दंड दिए जाने से उस अपराधी में सुधार की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। मृत्यु दंड के स्थान पर अन्य सजा दी जानी चाहिए। बंदी गृहों में सुधार कार्य बढ़ाये जाने चाहिए। आपने कहा हम वर्तमान में पंचम काल में जी रहे हैं हमारे अंदर जब भी शुभभाव आये उसी समय शुभ कार्य कर लेना चाहिए। कहा है जब लोहा गरम हो उस पर हथौड़ा मार देना चाहिए। बिना धर्म किए सुख मिलेगा नहीं, जो भाग्य में है वह भाग कर आएगा। प्रवचन सभा के अंत में मुनि श्रमण सागर जी ने आचार्य विद्यासागर जी महाराज को समर्पित कविता सुनाते हुए "कहा हमको जीवन देने वाले गुरु विद्यासागर हैं।
प्रातः काल अभिषेक के बाद शांति धारा का वाचन मुनि ओंकार सागर जी महाराज ने किया। दोपहर में तत्वार्थ सूत्र का वाचन एवं व्याख्या, रत्न करण्ड श्रावकाचार ग्रंथ पर व्याख्या मुनिराज के श्री मुख से हुई। संगीत मय सामूहिक आरती एवं श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर से पधारे अनिकेत शास्त्री जी के मंगल प्रवचन हुए।
