क्यों अब शहरों से भी ज्यादा गांव के लोग बीमार हो रहे. ??
कारण और निवारण... समस्या और समाधान..
भारत में ज्यादातर गांव के लोग क्यों तेजी से बीमार हो रहे?
क्या कारण है?
कैसे गांव में बढ़ती बीमारी को रोका जा सकता है?
हर एक के घर में कोई न कोई बीमार होगा, किसी न किसी का या घर परिवार के सदस्य का शहर कस्बे में इलाज चल रहा होगा..
Raghogarh -अगस्त सितंबर अक्टूबर बरसात के महीने और बाद तक तो गांव गांव में भयंकर बीमारी फैल जाती हैं, बुरे हालात हो जाते हैं, वायरल फीवर, डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, पेट दर्द, स्किन प्रॉब्लम और भी बहुत कुछ.
वैसे बीमारी का दौर तो पूरे वर्ष ही चलता रहता है, किसी के कोई गांठ तो किसी को कैंसर, किसी का लीवर तो किसी का हार्ट.. शुगर बीपी भी तेजी से गांव में पैर प्रसारता जा रहा है.
अब सवाल यह आता है ऐसा क्यों, जबकि पहले शहरों के लोग ज्यादा बीमार होते थे अब गांव के लोग भी उसी लाइन में आ खड़े हैं.
बहुत सीधा सा जवाब है...अब गांव में आपको हाइब्रिड बीजो से उत्पादित अनाज कीटनाशक नींदानाशक इनके असंतुलित उपयोग से हमारी जैव विविधता पर प्रतिकूल असर पढ़ने एवं पर्यावरण
प्रदूषण होने का दुष्परिणाम है
दूध, दही, मट्ठे की जगह कोल्ड ड्रिंक, चाय मिलेगी, जब से दूध डेरी कलेक्शन सेंटर खुल गए हैं गांव में तब से दूध ग्लास भर भी पीने को नहीं मिलता.
जो किसान खेतों में सबसे पहले अपने परिवार के लिए, साग सब्जी, बागवानी, और कई प्रकार के अनाजों की खेती करते थे, उन्हें अब सिर्फ बाजार दिखाई देती है, कृषि अब परिवार के लिए नहीं बल्कि बाजार के लिए होती है, किस फसल का रेट सबसे ज्यादा किस समय मिलेगा उसके लिए अगेती खेती की जाती है भयंकर रसायन डाल कर,परिवार के लिए नहीं.
मिश्रित कृषि छोड़कर सब मोनोक्रॉपिंग पर आ गए हैं..
जरूरत तो परिवार की, साग सब्जी,फल, दाल, रोटी,चावल, चना, जौ, घी, गुड, सब की रहती है, पर काम सिर्फ चल रहा है एक वक्त की दाल या एक वक्त सब्जी और गेहूं की रोटी से, या वह भी नहीं तो आलू उबालकर भर्ता बन गया या सिर्फ पौआ भर दूध में रोटी चली गई पेट के अंदर.
अब सर्दियों में घी,गुड,मेवा,तिल,अलसी,सोंठ के लड्डू नहीं बनते, अब गर्मियों में किसी के यहां जौ चना वाला सत्तू नहीं मिलता....
अब खेतों के एक हिस्से में परिवार के लिए साग सब्जी नहीं होती, गांव में रहकर भी कोई खेती नहीं करना चाहता, निराई गुड़ाई वाली मेहनत की जगह पेस्टिसाइड हरबिसाइड मिलता है..
शहर वालों के पास कृषि नहीं होती फिर भी सबसे पहले ताजी हरी सब्जी, भुट्टा, चना, अनाज और सीजनल चीजें उपलब्ध होती हो जाती हैं, क्यों क्योंकि उनकी जेब में पैसा होता है, पैसा फेंका और सामान प्राप्त किया...
गांव में तो बड़ी विडंबना है, न ही पैसा है और न ही खेतों में खुद के परिवार के लिए साग सब्जी फल अनाज, तो इसलिए गांव के आदमी की हालत और भी ज्यादा खराब होती जा रही इसलिए गांव में पौष्टिक खाने की और भी कमी है. उसके साथ रही कसर गुटका पाउच कई प्रकार नशे कयामत तरीके नसे पूरी कर देते हैं जो खाए जा रहे आदमी को और इस युवा पीढ़ी को.
अब सवाल यह उठता है कि इस समस्या का हल क्या है. कैसे बीमार और कमजोर कुपोषिति होते युवाओं, ग्रामीणों को बचाया जाए.. कैसे एक स्तर पर बीमारी से बचा जा सकता है.
तो उसके लिए हमें जो समझ आता है कि प्रत्येक ग्रामीण को एक छोटे स्तर पर खुद शुरुआत करनी होगी.. कुछ मुख्य कार्य.
1. खुद के परिवार के लिए सबसे नजदीक वाले खेत पर किचन गार्डन की शुरुआत, जिसमें वर्ष भर खुद
के लिए सब्जियां मिल पाए सीजन के अनुसार.
2. कृषि में मिश्रित कृषि को बढ़ावा, जिससे इनकम भी लगातार हो और कई प्रकार के अनाज साग सब्जी दालें भी मिलें.
3. खुद के परिवार के लिए आम, अमरूद, आंवला, नींबू, पपीता, केला और भी कई तरीके के फल वाले पेड़ पौधों को लगाना.
4. पशुपालन को भी बढ़ाना, छोटे स्तर पर पहले खुद के लिए ही प्राकृतिक एवं जैविक को अपनाना.
5. गांव के कुछ अच्छे लोगों के साथ ग्रुप बनाकर, समाज के लिए नई शुरुआत करना।।
6. खेतों पर प्रतिदिन दो से तीन घंटे सुबह शाम समय देना, कृषि कार्य सिर्फ जोतना बोना और काटना नहीं है. जिस दिन से खेतों पर कृषक लगातार समय देने लगेंगे जैसे सरकारी नौकरी वाले प्राइवेट नौकरी वाले और बिजनेस वाले देते हैं.. वैसे ही लगातार सुबह-शाम खेत को देना है और अलग-अलग फसलें करनी है, इससे इनकम भी बढ़ेगी और परिवार को खाने पीने वाली बहुत सारी पौष्टिक चीजें भी मिलेंगी.
मुश्किल है थोड़ा पर नामुमकिन नहीं है... प्रयास खुद को करने होंगे अन्यथा बीमारी अस्पताल तो बैठे ही हैं आपको लूटने और तबाह करने के लिए..
कोई ईश्वर और कोई शक्तिमान जमीन पर आपके पास नहीं आने वाले हैं, आपको खुद आगे बढ़ना होगा अपने और अपने परिवार के हालात सुधारने के लिए।।
उन्नत कृषक उधम सिंह लोधा ग्राम सोरामपुरा विकासखंड राघोगढ़ जिला गुना मध्य प्रदेश


