शिक्षक दिवस के अवसर पर विशेष प्रवचन
गुरु ने ज्ञान देकर हमें ज्ञानवान बनाया है उनका उपकार मानना चाहिए। मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 5 सितंबर। दिगंबर जैन आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य औजस्वी वक्ता महान तपस्वी, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने शिक्षक दिवस के अवसर पर राघौगढ़ नगर में विद्यासागर सभागार में विशाल धर्म सभा को संबोधित करते हुए "हमारे ज्ञान को कैसे बढ़ाएं" इस विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा शिक्षक ने हमें कक्षा में पढ़ाया हमने शिक्षक ने जिस विषय में पढ़ाया है उस विषय को बहुत गौर से सुना मगर हमें याद नहीं रहता है। याद नहीं रहने को हम ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता में कमी कहते हैं। ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाने आपने प्रवचन में अनेक उपायों का विस्तार से उल्लेख किया। मुनिराज ने कहा जैन आचार्य अकलंक स्वामी जो ग्रंथ पढ़ते थे एक बार में पूरा याद हो जाता था। उनके ही भाई आचार्य निकलंक स्वामी एक ग्रंथ को दो बार पढ़ते थे तब याद होता था। सबके अंदर सूर्य की भांति आत्मा में अपार ज्ञान भरा है। मगर ज्ञान पर अज्ञानता का आवरण पढ़ा होने से हमारी ग्रहण करने की क्षमता कमजोर रहती है।
मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाने के लिए 6 सूत्रों का उल्लेख किया जिसने ज्ञान दिया है उसका उपकार मानना, जिन गुरु ने ज्ञान दिया है उसका नाम नहीं छुपाना, सभी के प्रति वात्सल्य भाव रखना, सामने वाले की लकीर छोटी न कर अपनी लकीर बड़ी करने का प्रयास करना। सभी की विनय करना। किसी के निर्दोष ज्ञान में दोष न लगाना। आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने कहा था आजकल बच्चे ज्ञान के उपकरणों का दुरुपयोग करते हैं इस कार्य से भी ज्ञान क्षीण होता है। आपने विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कहा आज से लगभग 8 सौ वर्ष पूर्व इस विश्वविद्यालय में 9 हजार विद्यार्थियों ने शिक्षा प्राप्त की थी। इस विश्वविद्यालय में जिन विद्यार्थियों ने अध्ययन किया था किसी ने भी नैतिक अपराध नहीं किया। आज विद्यार्थी कक्षा में फर्नीचर तोड़ देते हैं, साथी की पुस्तक फाड़ देते हैं, स्कूल के ब्लैक बोर्ड पर अनावश्यक बातें लिख देते हैं। विद्यालय भवन में अनेक तरह के नुकसान कर देते हैं। इस गंदी प्रवृत्ति से ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता में कमी आती है। आपने जैन ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र के छठे अध्याय का उल्लेख करते हुए कहा मिट्टी के सकोरे में पहली बूंद कहां चली गई नहीं दिखती, दूसरी बूंद भी नहीं दिखती, तीसरी बूंद कुछ-कुछ दिखती है, चौथी बूंद स्पष्ट दिखने लगती है मुनि श्रमण सागर जी ने कहा जीवन में सफल होने के लिए छात्र के अंदर सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत एवं दृढ़ निश्चित होना चाहिए।
मुनि श्रमण सागर जी ने शिक्षक दिवस के अवसर पर अपने दीक्षा गुरु आचार्य विद्यासागर जी महाराज को समर्पित कविता सुनाते हुए कहा "दे दिया सब कुछ मुझे अब मैं उन्हें क्या भेंट दूं।
