राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचन माला
पति-पत्नी एक दूसरे का आदर कर जीवन सुखी बनाएं।
राघौगढ़ 2 सितंबर। धर्मनगरी राघौगढ़ में चातुर्मास कर रहे महान तपस्वी औजस्वी वक्ता बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने "दांपत्य जीवन का कड़वा सच" विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा वर्तमान में पति-पत्नी के संबंधों के बीच में आदर खत्म हो जाने से पारिवारिक जीवन में अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं। पति पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हैं एक दूसरे का आदर नहीं कर रहे हैं। बात-बात पर आपस में झगड़ा कर रहे हैं। आपसी विवाद न्यायालय में पहुंच रहे हैं और वैवाहिक संबंध विच्छेद हो रहे हैं। इस स्थिति में भारतीय संस्कारों की रक्षा नहीं हो रही है।
मुनि श्रमण शर्मा सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा पति घी के समान है और पत्नी शहद के समान है। आपने स्पष्ट कहा कि जैन दर्शन में शहद अभक्ष माना है।घी एवं शहद को बराबर मिला देंगे तो वह जहर बन जाएगा। घी 60% एवं शहद 40% मिश्रण करेंगे तो यह जहर न बनाकर औषधि बन जाएगा। इसी प्रकार पुरुष का स्थान ऊंचा है एवं पत्नी का स्थान पुरुष के बराबर नहीं है। पत्नी का स्थान नीचा है। पति-पत्नी में समानता की बात चल रही है आपने कहा कि पति और पत्नी के रिश्ते ऐसे हैं कि इसमें अगर समानता का प्रयास करते हैं तो परिवार टूट जाते हैं। पति को परमेश्वर कहा है। अगर पत्नी अपने पति को पहले को परमेश्वर कहेंगी तो पति भी पत्नी को परमेश्वरी कहेगा। पहले पिता व्यापार या नौकरी कर पैसे कमा कर घर परिवार का पालन पोषण करता था। पत्नी कुशल गृहिणी बनकर घर चलाती थी। आओ पत्नी भी नौकरी करती है ऐसे में पत्नी भी अपने आप को पति से काम नहीं मानती है। पति पत्नी में आपसी सामान जैसे एवं आदर प्रेम नहीं होने से परिवार नगर एवं देश में यह समस्या गंभीर हो गई है।
मुनि श्रमण सागर जी ने प्रवचन करते हुए स्पष्ट कहा कि पुरुष एवं स्त्री कभी भी समान नहीं हो सकते। जैन दर्शन का उदाहरण देते हुए आपने कहा पुरुष मुनि दीक्षा धारण कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। मगर स्त्री दिगंबर दीक्षा नहीं ले सकती। श्वेत वस्त्र धारी आर्यिका ही बन सकती है। जैन दर्शन में पुरुष का स्थान ऊंचा है एवं स्त्री का स्थान पुरुष से नीचे है।
