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*[यह आलेख (*राजतंत्र , प्रजातंत्र अथवा "भीड़ तंत्र") श्री लक्ष्मण सिंह जी, पूर्व सांसद द्वारा लिखित है]*

 *[यह आलेख (*राजतंत्र , प्रजातंत्र अथवा "भीड़ तंत्र") श्री लक्ष्मण सिंह जी, पूर्व सांसद द्वारा लिखित है]*


*राजतंत्र , प्रजातंत्र अथवा "भीड़ तंत्र"*

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सर्वप्रथम, आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं, माता रानी की कृपा आप हम सब पर बनी रहे देश में शांति हो, महंगाई कम हो और सुदृढ़ अथवा सस्ती शिक्षा व्यवस्था हो जिससे कि सभी लोगों को शिक्षा प्राप्त हो सके एवं भारत एक खुशहाल देश बन सके जैसा कि एक छोटा सा देश "फिनलैंड" विश्व में सातवीं बार सबसे खुशहाल देश घोषित किया गया है। परंतु ऐसा हो सकेगा इसकी संभावनाएं बहुत कम है क्योंकि हम प्रजातंत्र की चर्चा तो करते हैं, प्रजातंत्र को बचाने की चर्चा भी करते हैं , परंतु हम प्रजातंत्र में जो संविधान की सबसे बड़ी शक्ति है हमारी अपनी संसद और राज्यों की विधानसभा, इन्हें हमारे जनप्रतिनिधि जिन्हें हम चुनकर विधानसभा और संसद में भेजते हैं दुर्भाग्य वश चलने नहीं देते और आज जो एक अराजकता का वातावरण बना है इसका सबसे बड़ा दोष इन्हीं चुने हुए प्रतिनिधियों का है जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा है।

            बार-बार यह सुनने को आ रहा है कि प्रजातंत्र खतरे में है अगर ऐसा है तो संसद में चर्चा क्यों नहीं होती है ? विधानसभा में चर्चा क्यों नहीं होती है ? संसद का सत्र जो 15 दिन के लिए बुलाया जाता है केवल एक या दो दिन क्यों चल पाता है? और मध्यप्रदेश विधानसभा के सत्र के बारे में मैं दावे से कह सकता हूं कि पिछले कई सालों से केवल पांच या 7 दिन के लिए अधिकांश समय बुलाया गया जिसमें एक दिन चला या दो दिन चला और बजट सत्र भी जो अधिकतर 15 दिन का कम से कम होना चाहिए वह नहीं होते हुए केवल चार-पांच दिन चलता है और बिना चर्चा के कई बार मध्य प्रदेश की विधानसभा में करोड़ों रुपए का बजट पास कर दिया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि आज मध्यप्रदेश 5 लाख करोड़ के कर्ज में डूबा हुआ है। अगर तथाकथित नेताओं को प्रजातंत्र बढ़ाने का और संविधान बचाने का इतना शौक है तो संसद को और विधानसभा को चलने दें और यह सिद्ध करें कि हां वह इस विषय को गंभीरता से देखते हैं और मैं यह दावे से कह सकता हूं कि अगर उनके द्वारा अच्छे तर्क दिए जाएं सांसद और विधानसभा में चर्चा के समय तो कोई भी सरकार हो उसको उनकी बात सुनना भी पड़ेगी और मानना भी पड़ेगी और जब उनके दिए हुए तर्क से कोई काम बन जाता है या कोई नीति बन जाती है तो इसमें उन्हें श्रेय लेना चाहिए और जनता के बीच में जाना चाहिए और अगर वह ऐसा करते हैं तो जनता उन्हें पुनः चुनेगी परंतु दुर्भाग्यवश वे एक "भीड़ तंत्र" की राजनीति करते हैं। संसद और विधानसभा में तो कुछ बोलते नहीं है लेकिन बाहर जाकर भीड़ इकट्ठी करके और यह सिद्ध करते हैं कि उनके साथ जनता है और जब नतीजे आते हैं तो अपनी हार का ठीकरा वह अन्य संस्थाओं पर फोड़ देते हैं जबकि यह हार केवल उनकी अपनी कमजोरी और दूरदर्शिता के अभाव में अक्सर होती है।

        यहां मैं यह भी कहूंगा की जो चुनाव कराने वाली संस्थाएं हैं या अधिकारी हैं या जो चुनाव के समय सरकार में बैठे लोग हैं वह भी विपक्ष की कमजोरी का लाभ उठाते हैं क्योंकि उन्हें यह मालूम होता है कि विपक्ष के पास कोई सार्थक तर्क नहीं है और वह केवल एक दिखावे की राजनीति कर रहे हैं और इसीलिए वे विपक्ष को गंभीरता से नहीं लेते हैं और मनमाने तरीके से चुनाव को प्रभावित भी कर देते हैं इसके भी कई प्रमाण सामने आए हैं और इसीलिए आज यह अराजकता का वातावरण चुनाव आयोग को, SIR को और दुर्भाग्य वश सुप्रीम कोर्ट को लेकर भी बना हुआ है। मैंने वह समय भी देखा है जब संसद में विपक्ष के केवल दो सांसद थे माननीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई और माननीय आडवाणी जी परंतु संसद का सत्र पूरी तरह चलता था और चर्चा में जो तर्क अटल जी और आडवाणी जी देते थे उन तर्कों को गंभीरता से लिया भी जाता था और उन पर कार्यवाही भी होती थी ।मुझे पता है कई बातें जो अटल जी ने कहीं उनको बजट में शामिल किया गया था। मैं जब संसद में पहली बार चुन कर गया था 1994 में तब भाजपा विपक्ष में थी और माननीय अटल जी ने एक विषय उठाया था जिसमें डब्बे के दूध में जो शिशुओं को पिलाया जाता है ,उसमें कीड़े निकले थे और नरसिंह राव जी उस समय प्रधानमंत्री थे, उन्होंने तत्काल इस विषय का संज्ञान लिया और कार्रवाई भी हुई और सख्त कार्रवाई हुई। यही विश्वसनीयता विपक्ष को संसद में चर्चा करके और अपना पक्ष रखकर सिद्ध करना होगा अन्यथा विपक्ष को कोई अधिकार नहीं है कि वह संसद में बिना भाग लिए , बिना कोई चर्चा किये सरकार को दोषी कहे। दोष उनका खुद का है क्योंकि वह चर्चा से भाग जाते हैं और एक मजबूत पक्ष रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं संभवत वह पूरा अध्ययन करके नहीं आते हैं और उन सांसदों को बोलने नहीं दिया जाता जो तैयारी करके जाते हैं, केवल नेता प्रतिपक्ष बोलते हैं या उनके इर्द-गिर्द वाले लोग बोलते हैं जो विषय की गंभीरता से बहुत दूर होते हैं। यही मुख्य कारण है कि आज एनडीए कई वर्षों से केंद्र में सत्ता में बना हुआ है और नरेंद्र मोदी जी निरंतर प्रधानमंत्री बनते जा रहे हैं।

          इस स्थिति का सबसे ज्यादा फायदा अगर कोई लेता है तो वह है प्रशासकीय अधिकारी वर्ग। अगर आप टेलीविजन में ध्यान से देखें तो कई बार कैमरा उन अधिकारियों के मुस्कुराते हुए चेहरे पर भी दिखाया जाता है जो बैठे रहते हैं दर्शक दीर्घा में। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वो संसद नहीं चलने से इतने खुश क्यों है जब सारा देश दुखी होता है? यह संभवतः इसलिए होता है कि उन्हें निर्णय लेने की और भ्रष्टाचार करने का सुनहरा अवसर मिल जाता है क्योंकि संसद या विधान सभा जिनका भ्रष्टाचार रोकने का दायित्व है वो तो चलती ही नहीं है फिर उन्हें रोकेगा कौन? अगर विपक्ष उनके भ्रष्टाचार को उजागर करें , तथ्य समेत, तो जनता में विपक्ष की साख भी बनेगी, वोट भी मिलेगा और वह सरकार भी बनाएंगे। परंतु देखा यह गया है कि अधिकांश विपक्षी सदस्य  संसद और विधानसभा नहीं चलने देते हैं और नहीं चलने देने का एक मिला-जुला खेल होता है जिससे कि अधिकारी जो लूट मचाते हैं शासकीय धन की, उसमें इन नेताओं का हिस्सा भी होता है। यह बात जनता को समझना बहुत आवश्यक है क्योंकि अगर यह खेल चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब राज्यों के खजाने खाली हो जाएंगे और अधिकांश राज्य और देश कर्ज में डूबता चला जाएगा। भारत को हम आर्थिक मजबूत देश मानते हैं परंतु यह सच्चाई भी किसी से नहीं छिपी है कि हमारे ऊपर आईएमएफ (IMF), एक अंतरराष्ट्रीय संस्था जो कई देशों को ऋण देती है , जिसमें भारत भी सम्मिलित है, के भारी कर्ज में डूबा हुआ है और हमारे बजट का एक बहुत बड़ा भाग प्रतिवर्ष आईएमएफ के द्वारा दिए गए कर्ज का ब्याज देने में चुकाना पड़ता है। हमारे देश में महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण भी यही है कि हम भ्रष्टाचार को रोक नहीं पा रहे हैं और इस भ्रष्टाचार के कारण हमें इन संस्थाओं से प्रतिवर्ष ऋण लेना पड़ता है और मध्य प्रदेश का तो यह हाल है कि बाजार से भी पैसा उठाकर ब्याज पर सरकार चल रही है और आए दिन हम देखते रहते हैं कि आज इतने हजार करोड़ का ऋण लिया आज इतने हजार का करोड़ ऋण लिया और यही दशा देश के कई राज्यों की भी है। इसलिए मेरा सभी देश वासियों से अथवा देश के मतदाताओं से विनम्र अनुरोध है कि आप भावनाओं में आकर,भीड़ किसके साथ ज्यादा है बिना यह देख केवल यह देखें की कौन अपना फर्ज विधानसभा में या लोकसभा में सत्य एवं निष्ठा और ईमानदारी से निभा रहा है और कौन नहीं निभा रहा है और आने वाले चुनाव में बिना किसी सांप्रदायिकता की लहर को ध्यान में रखते हुए या किसी पार्टी के साथ जो भीड़ एकत्रित धन और बल से कर लेती है , उसको ध्यान में रखते हुए केवल एक बात पर ध्यान रखें कि भ्रष्ट कौन है और ईमानदार कौन है और अगर आपको इनमें कोई ज्यादा ईमानदार नहीं दिखे तो कोई आवश्यकता नहीं है कि आप किसी राजनीतिक दल के लोग को ही चुने आप किसी निर्दलीय प्रत्याशी को भी खड़ा करके चुन सकते हैं जो सत्य निष्ठा से काम करें और हमारे देश के और प्रदेश के ऊपर जो कर्ज बढ़ता जा रहा है उसे कम करने का प्रयास करें, महंगाई कम करने का प्रयास करें और केवल और केवल विकास की चर्चा करें।

             आजकल  राजनीति में नया चलन और चला है कि बहुत सारे, कई धर्म के "फर्जी बाबा" लोगों का प्रवेश भी राजनीति में धर्म की आड़ में, पिछले दरवाजे से हो चुका है। यह बाबा लोग आपको कई नेताओं के साथ, चाहे वह किसी दल के हो, अक्सर दिख जाते हैं और यह नेता लोग उनके द्वारा अनुष्ठान करवा कर भीड़ एकत्रित कर लेते हैं धर्म के नाम पर और यह बाबा उनके चुनाव एजेंट की तरह काम करते हैं। प्रजातंत्र में अगर कोई सबसे बड़ा खतरा प्रजातंत्र को है तो वह इन तथा कथित फर्जी बाबाओं का राजनीति में प्रवेश करने से ही है। जो ज्ञानी साधु है वह तो राजनीति की चर्चा भी नहीं करते हैं और कोई नेता अगर उनके पास जाता है उनका आशीर्वाद लेने तो वह स्पष्ट कह देते हैं कि उनके लिए सब बराबर हैं और वह राजनीति में रुचि नहीं रखते हैं वह केवल धर्म की रक्षा के लिए अपना समय बिताते हैं। आप लोग ऐसे साधुओं का ही सम्मान करें जो राजनीति की चर्चा ना करते हो और जिन्हें नेताओं के साथ देखा ना जाता हो। कई फर्जी बाबा लोग तो चुनाव के नतीजे की घोषणा चुनाव के पहले कर देते हैं और जब उनकी झूठी भविष्यवाणी गलत सिद्ध होती है तो वे गायब हो जाते हैं और कई वर्षों तक प्रकट नहीं होते या किसी अन्य राज्य में जाकर अपनी दुकान जमा लेते हैं। ऐसे लोगों से अगर हम दूर रहेंगे तभी हम भारत को एक मजबूत देश बना सकेंगे और एक खुशहाल देश बना सकेंगे जिसमें सांप्रदायिकता का विष न घुला हो।

          आज के तकनीकी युग में हम देख रहे हैं की "सोशल मीडिया" की  भूमिका जनजीवन में बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। जहां सोशल मीडिया हमें कई सुविधा उपलब्ध कराता है और हमारे संपर्क सूत्र को बढ़ाने में हमारी मदद करता है, हमें रोजगार उपलब्ध कराने में मदद करता है वहां इसका दुरुपयोग हमें अराजकता की ओर भी खींच ले जाता है जैसा कि हम आजकल राजनीति में देख रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि केंद्र शासन हो या राज्य शासन हो जिसके पास जनसंपर्क विभाग होता है , जनसंपर्क के अधिकारी होते हैं , मंत्री होते हैं और उनका काम यही है कि शासन की योजनाओं को जनता के बीच ले जाए और शासन के खिलाफ अगर कोई दुष्प्रचार हो रहा है या शासन के खिलाफ सोशल मीडिया के माध्यम से या अन्य माध्यम से कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है तो उन्हें उसको रोकना चाहिए और वह चूंकि इस षड्यंत्र को रोकने में असफल हो रहे हैं , विशेष कर सोशल मीडिया के दुष्प्रचार को, इसलिए विपक्षी दलों को यह अवसर मिल रहा है और वह अराजकता फैलाने में सफल हो रहे हैं क्योंकि सोशल मीडिया भीड़ इकट्ठी बहुत जल्दी कर लेता है और इस भीड़ को इकट्ठी होने से रोकने में जो शासन को कदम उठाने चाहिए वह नहीं उठा पा रहे हैं और इसीलिए यह वातावरण बन गया है। साथ में मैं यह भी कहना चाहूंगा कि दुर्भाग्य वश चुनाव आयोग के खिलाफ इतने सारे सवाल क्यों उठ रहे हैं? इसका मुख्य कारण यही मुझे लगता है की चुनाव आयोग कहीं ना कहीं जनता की भावनाओं को समझ नहीं पा रहा है या जानबूझकर समझना नहीं चाहता है। चुनाव आयोग का गठन कांग्रेस शासन काल में हुआ और चुनाव आयोग का दुरुपयोग उस समय से ही शुरू हो गया था इसके भी कई उदाहरण है , परंतु यह आवश्यक नहीं है कि अगर कांग्रेस शासन में चुनाव आयोग का दुरूपयोग हुआ है तो दूसरी पार्टी के शासन में भी उसे जारी रखना चाहिए सिर्फ यह कहकर कि पहले भी ऐसा होता था तो अब अगर हो रहा है तो क्या गलत है? केंद्र शासन अगर चुनाव आयोग को बचाने का प्रयास कर रहा है तो वह बहुत बड़ी भूल कर रहा है क्योंकि इस तरह अगर चुनाव आयोग ने काम किया तो जनता का विश्वास इन संस्थाओं से उठ जाएगा और यही प्रजातंत्र को सबसे बड़ा खतरा है और  हमारे संविधान को सबसे बड़ा खतरा है। अब तो यहां तक चर्चा हो रही है की चुनाव आयोग को भंग कर दिया जाए और स्थानीय अधिकारियों द्वारा चुनाव कराए जाएं जो कि मेरी राय में और भी खतरनाक सिद्ध होगा। इसलिए यह अति आवश्यक हो गया है की संसद में चर्चा हो और पक्ष-विपक्ष दोनों मिलकर चुनाव आयोग में जो सुधार लाने हैं वह लेकर आए और एक नया चुनाव आयोग का प्रारूप उभर कर सामने जो आए, उसे संसद में सर्वसम्मति से पारित करें। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो कल से अगर विपक्ष सत्ता में बैठ गया तो आप मान कर चलिए की आपसे ज्यादा दुरूपयोग फिर से करना शुरू कर देगा जैसा कि वह पहले से करता आ रहा है, इसीलिए देश के हित में , शासन के हित में यही है कि चुनाव आयोग में सुधार लाया जाए और क्या सुधार लाया जाए यह जनता से जरूर पूछ लीजिए। आजकल तकनीकी उपलब्ध है सोशल मीडिया के माध्यम से ही पूछ लीजिए और जनता के जो सुझाव आते हैं उन पर आधारित एक स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव आयोग और एक नए चुनाव आयोग के प्रारूप का गठन करें। तभी हमारा देश और देश का संविधान सुरक्षित रह पाएगा और तभी हम भ्रष्टाचार को नियंत्रित कर सकेंगे और तभी हम ऐसे लोगों को चुन सकेंगे जिनके पास धन नहीं है या बल नहीं है पर देश प्रेम की भावना उनके दिलों में है और कुछ कर दिखाने का जज्बा हमारे नौजवानों में है , ऐसे नए-नए नेता उभर कर आएंगे जो इस देश को आगे ले जाएंगे। यह नौजवान जो साधारण परिवारों से आते हैं या गरीब परिवारों से आते हैं अगर चुनकर संसद या विधानसभा में बैठेंगे तो हमारा देश आर्थिक रूप से राजनीतिक रूप से और मजबूत होगा और सबको बराबर का अवसर मिलेगा केवल कुछ धनाढ्य लोगों का अधिपत्य राजनीति में नहीं रहेगा। तभी हम हमारे सपनों का भारत बना सकते हैं जिसे हम विश्व गुरु के रूप में देखना चाहते हैं। धन्यवाद जय हिंद।


(दिनांक:13,अक्टूबर,2026)


     भवदीय

(लक्ष्मण सिंह)

पूर्व सांसद 

मोबाइल :- 8889007555, 9425131577



                *[यह आलेख (*राजतंत्र , प्रजातंत्र अथवा "भीड़ तंत्र") श्री लक्ष्मण सिंह जी, पूर्व सांसद द्वारा लिखित है]*

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