राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचन माला।
वर्तमान में शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना हो गया है।
मुनि श्रमण सागर जी ने कहा विदेशी शिक्षा में अध्यात्म का उल्लेख नहीं।
राघौगढ़ 6 अगस्त। धर्मनगरी राघौगढ़ में ससंघ चातुर्मास कर रहे महान तपस्वी ओजस्वी वक्ता बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने श्रमण धारा प्रवचन माला में आज शिक्षा में अध्यात्मिक विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा भारतीय शिक्षा पद्धति से 6 उद्देश्यों की पूर्ति होती है। ज्ञानार्जन करना, जीने की कला सीखना, जीविकोपार्जन अथवा धन कमाना, नैतिकता सीखना, चरित्र का निर्माण करना और अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त करना। आपने उदाहरण देते हुए कहा दूध से घी बनाने के लिए पहले दूध, दही,छाछ,पनीर , फिर मक्खन इसके बाद घी बनता है। विदेश में दूध की यात्रा मक्खन तक है। विदेश में घी नहीं बनाया जाता है। इसी प्रकार विदेश में शिक्षा के माध्यम से ज्ञानार्जन जीने की कला, जीविकोपार्जन नैतिकता और चरित्र निर्माण तक यह यात्रा रुक जाती है। विदेशी शिक्षा में अध्यात्म का कहीं उल्लेख नहीं है। विदेश में भी नहीं बनाकर मात्र मक्खन की टिकिया का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार विदेशों में अध्यात्म की गंध कहीं नहीं है। हमारा दुर्भाग्य है कि भारत में भी विदेशी शिक्षा का फैलाव जोर-जोर से हो गया है। विदेशी शिक्षा पद्धति को अपनाकर भारत में भी नई पीढ़ी अध्यात्म से विमुख होती जा रही है।
मुनिराज ने प्रेरणा जी की लौकिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को अध्यात्म की शिक्षा भी देना जरूरी है तब ही भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों की रक्षा होगी। अपने अंत में कहा कहावत है सुबह का भूला अगर शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते हैं।
राघौगढ़ नगर में मूनि श्रमण सागर जी एवं मुनि ओंकार सागर जी महाराज के चातुर्मास मंगल कलश की स्थापना का कार्यक्रम आगामी 9 अगस्त रविवार को आचार्य विद्यासागर भवन में दोपहर 1 बजे से आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजन को सफल बनाने इंदौर से प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी तरुण भैया जी पधार रहे हैं। इस दिन अनेक कार्यक्रम होंगे एवं मुनि श्री के मंगल प्रवचन भी होंगे। जैन समाज राघौगरने इस कार्यक्रम में पधारने के लिए आमंत्रण पत्र भेजे हैं।
