राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचन माला
शेर होकर भी आप गीदड़ का जीवन यापन कर रहे हो
नौकरी कर सेवक वन मालिक के हर आदेश का पालन करना होता है।
राघौगढ़ । धर्मनगरी राघौगढ़ में ससंघ चातुर्मास कर रहे महा तपस्वी, औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने श्रमण धारा प्रवचन माला में आज प्रवचन करते हुए कहा आप शेर हो मगर आपको यह ज्ञान नहीं है कि मैं शेर हूं। आपने कहा भूख लगने पर कुत्ता तो गंदगी भी खा लेता है। मगर शेर भूख लगने पर गंदगी नहीं खाता और शेर स्वयं शिकार कर ही भोजन करता है। आगे कहा आप अपने घर से भगाने के लिए कुत्ता को डंडा दिखाते हैं तो कुत्ता डंडे को पकड़ता है। जबकि शेर उसे जो डंडा मार रहा है उस पर वार करता है। मुनिराज ने वर्तमान में अच्छी पढ़ाई कर नौकरी कर सेवक बनने की प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कहा अपने बच्चों को सेवक ना बनाएं उन्हें स्वयं का व्यापार करने प्रेरित करें।
रामायण कालीन उदाहरण देते हुए मुनिराज ने कहा जब रामचंद्र जी के आदेश पर सेनापति कृतांत वक्र सीता जी को वन में छोड़ने गया। उस समय सेनापति कृतांत वक्र ने सीता जी से कहा
मेरी यह मजबूरी है कि मैं सेवक हूं। सेवक को मलिक के हर आदेश का पालन करना पड़ता है।
सज्जन व्यक्ति कभी गलत कार्य का समर्थन नहीं करता। सेवक को मालिक की आज्ञा में गलत कार्य करना पड़ता है। आपने दिगंबर जैन आचार्य विद्यासागर जी महाराज के प्रवचनों के अंश का उल्लेख करते हुए कहा राजा रामचंद्र जी ने एवं गुरु द्रोणाचार्य ने पद पर रहकर न्याय में कमी कर दी। रामचंद्र जी को पता था सीता पतिवृता है फिर भी वनवास दिया। लोक अपवाद में और दूसरी सजा भी दे सकते थे। गुरु द्रोणाचार्य में एकलव्य को गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांग कर न्याय नहीं किया। जबकि एकलव्य में अर्जुन से ज्यादा गुरु भक्त थी।
