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आलेख शीर्षक **धर्म कर्म और मर्म समझकर व्रत रखे

 # आलेख

शीर्षक 


 **धर्म कर्म और मर्म समझकर व्रत रखे **


**लेखक — प्रतिक संघवी राजकोट गुजरात**



मनुष्य ने घड़ी बनाई है, लेकिन समय नहीं बनाया। कैलेंडर मनुष्य ने बनाया है, लेकिन सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रमा की कलाएं और ऋतुओं का परिवर्तन प्रकृति के नियमों से होता है। भारत की प्राचीन सभ्यता की विशेषता यही रही है कि उसने समय को केवल घड़ी की सुइयों और तारीखों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सूर्य, चंद्रमा, तिथि, पक्ष, नक्षत्र और ऋतुचक्र के माध्यम से उसे समझने का प्रयास किया।


आज हम आधुनिकता के नाम पर अपनी अनेक परंपराओं को बिना समझे पुराना या अवैज्ञानिक घोषित कर देते हैं। रात 12 बजे तारीख बदलना आधुनिक नागरिक और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए आवश्यक और उपयोगी है, लेकिन धार्मिक काल-गणना का आधार हमेशा केवल यही नहीं रहा है। भारतीय परंपराओं में अनेक धार्मिक कार्यों के लिए सूर्योदय, तिथि और विशेष मुहूर्त का महत्व होता है। इसलिए धार्मिक समय को केवल आधुनिक घड़ी और कैलेंडर के आधार पर समझना हमेशा पर्याप्त नहीं है।


सबसे बड़ी समस्या आधुनिक समाज की यह बनती जा रही है कि हम हर चीज को अपनी सुविधा के अनुसार बदलना चाहते हैं। समय नहीं है तो पूजा छोटी कर दो, नियम कठिन है तो नियम बदल दो और परंपरा समझ में नहीं आती तो उसे अंधविश्वास घोषित कर दो। निश्चित रूप से समाज में मौजूद गलत प्रथाओं और अंधविश्वासों का विरोध होना चाहिए, लेकिन हर पुरानी परंपरा को बिना समझे गलत मान लेना भी बुद्धिमानी नहीं है। **हर पुरानी चीज अंधविश्वास नहीं होती और हर नई चीज प्रगति नहीं होती।**


सनातन परंपरा को केवल मंदिर, तिलक और पूजा-पाठ तक सीमित कर देना भी उचित नहीं है। सनातन जीवन, प्रकृति, समय, कर्म, सत्य और कर्तव्य के प्रश्नों पर विचार करने की परंपरा है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में दर्शन, योग, आयुर्वेद, गणित और खगोल जैसे विषयों का विकास हुआ। इसका अर्थ यह नहीं कि हर धार्मिक मान्यता आधुनिक विज्ञान द्वारा सिद्ध हो चुकी है, लेकिन यह अवश्य है कि भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा को बिना अध्ययन किए मूर्खता कहकर खारिज कर देना बौद्धिक ईमानदारी नहीं है।


व्रत और उपवास का अर्थ भी केवल भूखा रहना नहीं है। क्योंकि उपवास दो शब्दों से बना हे उप + वास यानी कि व्रत के साथ इन्द्रियों पर भी उस दिन काबू रखना है।यदि पेट खाली हो लेकिन मन क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और द्वेष से भरा हो तो केवल भोजन का त्याग व्यक्ति को धार्मिक नहीं बना सकता। वास्तविक व्रत आत्मसंयम, विचारों की शुद्धि और अपने व्यवहार को बेहतर बनाने का प्रयास है। **भूखा रहना आसान है, लेकिन अपने क्रोध और लोभ पर नियंत्रण रखना कठिन है।**


धर्म का सबसे बड़ा शत्रु आधुनिकता नहीं, बल्कि पाखंड है। कोई व्यक्ति पूजा करे लेकिन दूसरों के साथ अन्याय करे, रिश्वत ले, कमजोर का शोषण करे या समाज में नफरत फैलाए, तो केवल धार्मिक पहचान उसे धार्मिक नहीं बना सकती। धर्म का वास्तविक स्वरूप व्यक्ति के चरित्र और कर्मों में दिखाई देना चाहिए। **धर्म का पहला मंदिर मनुष्य का चरित्र है।**


धर्म का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं है। सच्चा धर्म अपने देश, इतिहास, भाषाओं और सभ्यता को समझने तथा उनका सम्मान करने में है। धर्म से प्रेम का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी गलतियों को स्वीकार न करें, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि अलग दृष्टिकोण से अपनी हर परंपरा को हीन समझने लगें। **सच्चा धर्म अंधभक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान आधारित आत्मसम्मान है।**


आज भारत को दो प्रकार की मानसिक गुलामी से बाहर निकलना होगा—पहली, यह मानना कि जो पश्चिमी है वही आधुनिक है और जो भारतीय है वह पुराना है; दूसरी, अपनी परंपराओं को बिना समझे केवल इसलिए स्वीकार करना कि पूर्वज ऐसा करते थे। हमें न अंधा गर्व चाहिए और न अंधी शर्म। हमें चाहिए अपनी सभ्यता के प्रति ज्ञान, विवेक और आत्मसम्मान।


भारत को अपनी जड़ों से जुड़ना है, लेकिन पीछे नहीं जाना। हमें विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष और आधुनिक विकास में दुनिया के साथ आगे बढ़ना है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान खोकर नहीं। हमें आधुनिक बनना है, लेकिन आत्मविहीन नहीं; वैज्ञानिक बनना है, लेकिन अपनी ज्ञान-परंपरा से अनजान नहीं।


अंततः धर्म केवल मंदिर में नहीं है, केवल व्रत में नहीं है और केवल तिलक में भी नहीं है। धर्म हमारे विचारों, व्यवहार और कर्मों में होना चाहिए। **प्रकृति को समझना, परंपरा को जानना, विवेक से सोचना और ईमानदारी से अपना कर्तव्य और धर्म निभाना—यही सनातन धर्म की वास्तविक शक्ति है।**

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