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जीवन में शांति चाहिए तो इच्छाओं को शांत करो मुनि श्रमण सागर जी

 उत्तम आकिंचन्य धर्म पर मंगल प्रवचन 

जीवन में शांति चाहिए तो इच्छाओं को शांत करो मुनि श्रमण सागर जी


 राघौगढ़ 24 सितंबर। जैन धर्म के पवित्र दस लक्षण धर्म के नौ वे दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म पर विशाल धर्म सभा में मंगल प्रवचन करते हुए दिगंबर जैन आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, महान तपस्वी, औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने कहा उत्तम आकिंचन्य धर्म हमें यह प्रेरणा देता है कि दुनिया में, घर गृहस्थी में जो भी है वह किंचित भी मेरा परिग्रह नहीं है। संसार के सभी प्राणियों को वस्तु का वास्तविक स्वरूप पता नहीं है। जो नश्वर है उसे  अपना मानकर जीने वाले मिथ्या दृष्टि कहलाते हैं। आपने कहा घर गृहस्थी में रहकर वैराग्य के भाव नहीं आ सकते। घर में रहकर नुक्ती का स्वाद तो मिल जाएगा मुक्ति नहीं मिलेगी। दुनिया में ऐसे भी वैरागी साधु हैं उन्होंने घर गृहस्थी संसार छोड़ दिया है और जंगल में रहने लगे हैं। जंगल में जिस कुटिया में रहते हैं उस कुटिया को ही अपनी मानना, जैन दर्शन में यह भी परिग्रह है। मुनिराज ने आगे कहा दुनिया में लाखों करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें वैराग्य की वास्तविक परिभाषा पता नहीं है। आपने आगे कहा दिगंबर मुनि अपने साथ शुद्धि के लिए कमंडल, संयम पालनके लिए पिच्छिका एवं ज्ञानार्जन के लिए शास्त्र रखते हैं। यह उपकरण उन्हें आवश्यक बताए हैं। मगर यह उपकरण भी किंचित परिग्रह की श्रेणी में आते हैं। जैन मुनि जब दीक्षा लेते हैं उस समय कठोर साधना का व्रत लेते हैं। कठोर तपस्या करते हुए शिथिलाचार में दिगंबरत्व का मूल्य कम हो जाता है। श्रावकों द्वारा मुनिराज की जरूरत से ज्यादा चापलूसी से मोक्ष मार्ग कठिन हो रहा है। जहां-जहां वस्तु है वहां कदम कदम पर राग है। आपने अपने दीक्षा गुरु आचार्य विद्यासागर जी महाराज के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा संत की अंतिम कमजोरी ख्याति पूजा की चाह है। आपने प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के सुपुत्र भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा जैन दर्शन में चक्रवर्ती 6 खंड का अधिपति होता है। 96 हजार रानियां होती हैं। 32 हजार मुकुंट वद्ध राजा उनके अधीनस्थ होते हैं। भरत चक्रवर्ती के बारे में उल्लेख है कि वह घर में ही वैरागी थे। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने राज पाट,धन, वैभव समस्त परिग्रह छोड़कर मुनि दीक्षा ली तभी मोक्ष पद प्राप्त किया। आपने सभी को प्रेरणा दी कि जीवन में सभी तरह के परिग्रह को त्याग कर आत्म कल्याण की ओर बढ़े ।यह संदेश हमें उत्तम आकिंचन्य धर्म से मिलता है। 

                        कार्यक्रम संयोजक विकास कुमार जैन ने बताया है दस लक्षण धर्म के अंतिम दिन 25 सितंबर को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर मुनि श्रमण सागर जी महाराज के मंगल प्रवचन प्रातः 8:30 बजे से विद्यासागर सभागार में होंगे। प्रातः प्रातः 6:30 बजे से भगवान का अभिषेक शांति धारा होगी। जैन धर्म के 12 वे तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी के मोक्ष कल्याणक पर विशेष पूजा अर्चना की जावेगी। दोपहर 1 बजे से दस लक्षण पर्व के समापन पर जैन समाज राघौगढ़ द्वारा जुलूस निकाला जाएगा। जो नगर के प्रमुख मार्गो से होकर विद्यासागर भवन में आएगा।जहां पर अभिषेक शांति धारा एवं फुलमाल के कार्यक्रम होंगे। तत्पश्चात जैन समाज राघौगढ़ द्वारा सामुहिक क्षमा पर्व मनाया जायेगा।

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