राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचनमाला
रावण अभिमानी था, श्री राम स्वाभिमानी थे। अभिमान में लंका एवं परिवार नष्ट हो गया।
जामनेर से गुरु तीर्थ वंदना पदयात्रा दल राघौगढ़ आया।
राघौगढ़ 6 सितंबर। धर्मनगरी राघौगढ़ में चातुर्मास कर रहे आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने "अभिमान एवं स्वाभिमान में अंतर" विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा रावण की लड़ाई अभिमान की थी और श्री राम की लड़ाई स्वाभिमान की थी। रावण अहंकारी था, अहंकार के कारण ही उसने महा सती सीता का अपहरण किया। श्री राम ने स्वाभिमान पूर्वक लंका पर चढ़ाई कर सीता को रावण के यहां से मुक्त कराया। इस लड़ाई का यह परिणाम हुआ कि सोने की लंका जलकर राख हो गई और रावण के पूरे कुल का नाश हो गया। मैं ही सब कुछ हूं, यह व्यक्ति का अभिमान है, मैं भी हूं यह स्वाभिमान है। मुनिराज ने आगे कहा दुनिया में चार प्रकार के लोग होते हैं पहले जिनको न तो अभिमान है न स्वाभिमान है। दूसरे वे जिनको अभिमान भी है और स्वाभिमान भी है। तीसरे वे जिनको अभिमान है स्वाभिमान नहीं। चौथे हुए हैं जिनको अभिमान नहीं है स्वाभिमान रग रग में भरा है। आपने कहा पहले तीन का कोई मूल्य नहीं है। चौथे जो हैं जिनको अभिमान नहीं है स्वाभिमान रग रग में भरा है। ऐसी श्रेणी में इस सदी के महान संत आचार्य विद्यासागर जी महाराज आते हैं। आपने जैन दर्शन की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए कहा भगवान आदिनाथ के सुपुत्र भरत चक्रवर्ती ने अपने भाई बाहुबली पर चक्र चला दिया था। यह भरत चक्रवर्ती का अभिमान था। मुझे किसी की जरूरत नहीं है यह मेरा अभिमान है सबको मेरी जरूरत है यह मेरा स्वाभिमान है। आपने आचार्य विद्यासागर जी महाराज के प्रवचनों का उल्लेख करते हुए कहा जब अहंकारी का पेट निकलता है वह किसी को गले नहीं लगाता।। मुनि श्रमण सागर जी ने कहा जब भी मन में घमंड आए अपने से ऊपर वाले को देख लेना। मन में हीन भावना आए तो अपने से नीचे वाले को देख लेना। आपने आगे कहा सब हमारे, हम सब, हमारे, हम, आदि शब्द बोलने में तो छोटे हैं मगर उनके अर्थ बहुत व्यापक हैं। मैं शब्द सबसे खराब है इस शब्द को बोलने वाला अभिमानी कहलाता है।
आज जामनेर से जैन समाज के श्रद्धालुओं का गुरु तीर्थ वंदना पदयात्रा दल 40 किमी बरसात में चलकर राघौगढ़ आया। सभी ने राघौगढ़ में विराजमान मुनि श्रमण सागर जी एवं मुनि ओंकार सागर जी महाराज के दर्शन किए एवं चातुर्मास उपरांत जामनेर पधारने का निमंत्रण दिया। जैन समाज राघौगढ़ द्वारा पधारे सभी पदयात्रियों का दुपट्टा माला पहनाकर एवं तिलक लगाकर सम्मान किया। यात्रा दल में श्रद्धालु पुरुष महिलाएं युवक लगभग 50 से अधिक आए थे।
