पदोन्नति प्रकरण:पलायन और पक्षपात की जुगलबंदी
*निर्विवाद समाधानों की अनदेखी की गयी:आग पानी से बुझती है घी से नहीं।*
*मध्यप्रदेश में शासकीय सेवकों का पदोन्नति प्रकरण पिछले एक दशक से पलायन और पक्षपात की जुगलबंदी से होकर गुजरता रहा है।लोकप्रशासन का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि एक निश्चित अवधि के बाद लोकसेवकों का वेतन भले ही न बढ़े पर उनका पदनाम जरूर बदलते रहना चाहिए तभी उनका उत्साह बरकरार रहता है।पूरे एक दशक से पदोन्नतियों से वंचित रहने के बाद नौकरशाही में कितना उत्साह बचा होगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।उत्साहहीन नौकरशाही से सुशासन का लक्ष्य कैसे पाया जायेगा यह समझ से परे बात है।और यह स्थिति तब है जब उच्चाधिकारी बाकायदा पदोन्नति ले रहे हैं उनकी पदोन्नति में एक दिन की भी देरी बर्दाश्त नहीं होती।सुबह पद खाली होता है और शाम को उस पद पर पदोन्नति आदेश निकल जाता है।इन दृश्यों को देख रहे और खुद पदोन्नति से वंचित छोटे कर्मचारियों से दक्षता कार्यकुशलता लगन तत्परता की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?अधीनस्थ नौकरशाही में व्याप्त इस निरूत्साह का खामियाजा पिछले एक दशक से प्रदेश की आठ करोड़ जनता को भुगतना पड़ रहा है।*
*एक दशक लंबे इस पूरे एपीसोड में पलायन और पक्षपात की जुगलबंदी नज़र आती है।ऐसा लगता है कि एक अदृश्य दबाव लगातार तारी रहा है।उस दबाव के कारण कभी इस प्रश्न से पलायन किया गया और कभी पक्षपात किया गया।*
*ऐसा नहीं है कि समाधान नहीं थे। मैंने स्वयं ये समाधान शासन को बार बार बताये।पर इन समाधानों की अनदेखी की गयी।राज्य प्रशासनिक सेवा की भांति समयमान वेतनमान के साथ उच्च पदनाम दिया जाना एक बिल्कुल सरल हल था लेकिन इसे नजर अंदाज किया गया जबकि अनेक विभागों/संवर्गों ने इसे चुपके से लागू कर लिया।*
*नये नियमों में यदि यह प्रावधान कर दिया जाता कि 36% वाले 36% में ही रहेंगे और 64% वाले 64% में। आरक्षित,अनारक्षित में नहीं जायेगा और अनारक्षित,आरक्षित में तो खैर जा ही नहीं सकता।कोई भी जूनियर सीनियर के ऊपर नहीं जायेगा।पदोन्नतियां जबसे बंद हुईं थीं तभी से शुरू की जायेगी अर्थात 2016 से। पिछले त्रूटिपूर्ण नियमों के कारण जिन संवर्गों में निर्धारित 36% से अधिक आरक्षण हो गया है उन संवर्गों में आरक्षित वर्ग की पदोन्नतियां तब तक रुकी रहेंगी जब तक आरक्षित वर्ग का प्रतिशत घटकर 36% पर नहीं आ जाता।ये सभी प्रावधान न्यायसंगत हैं और किसी भी वर्ग के प्रति पक्षपाती नहीं हैं।केवल इतने प्रावधान कर देने से विवाद शांत हो सकता था और दोनों वर्ग सहमत हो सकते थे ऐसा मेरा विश्वास है।परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ या नहीं किया गया।
