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समस्याएं अनेक-कारण एक और निवारण भी एक

समस्याएं अनेक-कारण एक और निवारण भी एक


Bhopal-

 आये दिन किसी न किसी वर्ग/संवर्ग के कर्मचारी अपनी न्यायोचित समस्याओं के लिए धरना प्रदर्शन आंदोलन करते दिखाई देते हैं।जनता परेशान होती है और शासकीय समय श्रम और धन की हानि होती है।*

*यूं देखने में समस्याएं अलग-अलग नज़र आती हैं परन्तु गहराई में जाकर देखिए तो सभी समस्याएं एक ही कारण से उत्पन्न हो रही हैं। और वह कारण है समानता और समकक्षता की अनदेखी।मैं अपनी बात कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करता हूं। ग्रामीण अंचलों में पशुओं के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के लिए पशु चिकित्सा क्षेत्र सहायक होते थे और मनुष्यों के लिए एएनएम थी। शैक्षणिक योग्यता और प्रशिक्षण अवधि समान थी। वेतनमान समान था। बाद में पशु चिकित्सा क्षेत्र सहायक का वेतनमान बढ़ता चला गया। पदनाम भी बदलकर पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी हो गया।समकक्ष पद/कार्य होते हुए भी एएनएम को समानुपातिक लाभ नहीं दिया गया। प्रदेश के सभी लिपिकों को चौथा समयमान वेतनमान दिया परंतु मंत्रालय विधानसभा राजभवन के लिपिकों को नहीं दिया गया।समयमान वेतनमान योजना जब लागू की गयी तो कर्मचारियों को 10 वर्ष बाद और अधिकारियों को 08 वर्ष बाद समयमान दिया गया।यह तर्क आज तक समझ में नहीं आया कि यह 10 वर्ष और 08 वर्ष का अंतर क्यों रखा गया।सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों पर पांच विभागों-राज्य प्रशासनिक सेवा,कोष एवं लेखा इत्यादि में समयमान के साथ उच्च पदनाम देने की व्यवस्था लागू कर ली गयी बाकी विभागों में नहीं की गयी।अमीन और टाइम कीपर का काम* *समान है परंतु वेतनमान पृथक हैं। मज़े की बात है कि मंत्रालय की लिफ्ट चलाने वाले और कलेक्ट्रेट की लिफ्ट चलाने वाले की वेतन में भी अंतर है।प्रदेश के सभी कर्मचारियों यहां तक कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता,सहायिका  इत्यादि की भी सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष कर दी गयी परंतु होमगार्ड जवानों की नहीं बढायी गयी।पटवारी और भू सर्वेयर का काम समान था लेकिन भू सर्वेयर का वेतन बढ़ गया।सभी विभागों में लिपिकीय पदों से कार्यपालिक पदों पर जाने का कोटा है लेकिन मंत्रालय/विधानसभा/राजभवन के लिपिकों के लिए नहीं है।सभी विभागों में लेखापाल हैं योग्यता/दायित्व समान है पर वेतनमान अलग-अलग हैं।ऐलीपैथी के फार्मासिस्ट/कंपाउंडर को अधिक वेतन मिलता है तो आयुर्वेद/होमियोपैथी के फार्मासिस्ट/कंपाउंडर को कम मिलता है।खाद्य निरीक्षक,राजस्व निरीक्षक,आबकारी निरीक्षक,ड्रग निरीक्षक,सहकारिता निरीक्षक,श्रम निरीक्षक-बहुत सारे निरीक्षक होते हैं परंतु उनके वेतन भत्ते अलग-अलग हैं।स्थायीकर्मी वही काम करते हैं जो नियमित कर्मचारी करते हैं परंतु स्थायीकर्मी को अभी तक सातवां वेतनमान भी नहीं मिला।विधि विभाग में पदोन्नतियां 2016 से ही दी गयी बाकी सभी विभागों में 2025 से दी गयी। समानता और समकक्षता के सिद्धांत की अनदेखी का सबसे ज्यादा शिकार लिपिक वर्ग हुआ। मध्यप्रदेश के गठन के बाद से आजतक लिपिक के दायित्व बढ़ते गये और तकनीकी योग्यता भी बढ़ती गयी परंतु वेतन घटता गया। लिपिक,पटवारी, ग्राम सेवक,एएनएम, प्राथमिक शिक्षक-ये सब समान वेतन में हुआ करते थे लेकिन आज लिपिक और इनके वेतन में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है।यह स्थिति तब है जब मध्यप्रदेश के लिपिक के लिए केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारों के लिपिकों से भी अधिक योग्यता निर्धारित है।मध्यप्रदेश का लिपिक सीपीसीटी जैसी विशेषज्ञतापूर्ण परीक्षा उत्तीर्ण कर भर्ती होता है। मध्यप्रदेश को छोड़कर अन्य किसी भी जगह सीपीसीटी का प्रावधान नहीं है। पहले लिपिक को केवल हिन्दी में काम करना अनिवार्य था लेकिन अब हिंदी अंग्रेजी दोनों भाषाओं में काम करना अनिवार्य है। परंतु वेतन वही है।डाटा एंट्री आपरेटर का काम लिपिक के समकक्ष है बल्कि कुछ कम ही है लेकिन डाटा एंट्री आपरेटर का वेतन लिपिक से अधिक है। ये केवल कुछ उदाहरण हैं। इस तरह के उदाहरणों की एक लंबी श्रृंखला है।मध्यप्रदेश शासन ने समय समय पर ब्रह्मस्वरूप समिति, सिंहदेव समिति, अग्रवाल आयोग, नाथ आयोग, सिंघल आयोग जैसी अनेक समितियां/आयोग गठित किये। वर्ष 2018 में गठित अग्रवाल आयोग ही एकमात्र आयोग था जिसने समानता और समकक्षता के तर्क को स्वीकार किया था और इसी तर्क के आधार पर कुछ संवर्गों को उनके समकक्ष संवर्गों के समतुल्य वेतन दिए गए थे। लेकिन अग्रवाल आयोग ने भी अधूरा काम किया था।*

*यदि सरकार समानता और समकक्षता का सिद्धांत कड़ाई से लागू कर दे तो आये दिन होने वाले आंदोलन शांत हो सकते हैं और सुशासन के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ा जा सकता है।*

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