राघोगढ़ में श्रमण धारा प्रवचनमाला
राम, भरत, लक्ष्मण जैसे आदर्श भाई बने, दुर्योधन जैसे नहीं मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 30 सितंबर। चातुर्मास में राघौगढ़ में जारी श्रमण धारा प्रवचन माला में आज "आदर्श भाई कैसा हो" इस विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, विद्या कुल शिरोमणि, महा तपस्वी, औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने कहा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम आदर्श भाई थे, जिन्होंने अपने भाई भरत को राजगद्दी पर बैठने के लिए वनवास स्वीकार किया। आदर्श भाई का अनूठा उदाहरण भरत ने भी प्रस्तुत किया उन्होंने राजगद्दी पर ना बैठकर अपने ज्येष्ठ भ्राता रामचंद्र जी की चरण पादुकाएं सिंहासन पर रखकर 14 वर्ष तक सन्यासी का जीवन बिताया। लक्ष्मण जी भी आदर्श भाई की श्रेणी में आते हैं उन्होंने देखा कि भाई वनवास जा रहे हैं तो वह भी उनके साथ चल दिए। महाभारत काल की कथा का उदाहरण देते हुए आपने कहा दुर्योधन इस श्रेणी में नहीं आता है उसका उद्देश्य था मेरी संपत्ति तो मेरी है मेरे भाइयों की भी संपत्ति मेरी है। पांडवों ने यह प्रस्ताव दिया कि हम पांच भाइयों को मात्र पांच गांव दे दो, मगर दुर्योधन ने लोभ के वशीभूत पांच गांव भी नहीं दिए। जैन दर्शन में भरत चक्रवर्ती एवं उनके भाई बाहुबली का भी उदाहरण देते हुए आपने कहा भरत चक्रवर्ती ने संपत्ति को लेकर अपने भाई बाहुबली पर ही चक्र चला दिया था। आपने यह भी उल्लेख किया जब भरत चक्रवर्ती को अपनी भूल का एहसास हुआ उन्होंने पश्चाताप किया और भरत जी घर में ही बैरागी कहलाए। रावण के भाई विभीषण का उदाहरण देते हुए आपने कहा विभीषण ने सत्य का साथ देने भाई का साथ छोड़कर श्री राम का साथ दिया। आपने यह भी कहा रामायण कालीन युद्ध में राम की विजय इसलिए हुई की उनके साथ उनका भाई था। रावण की हार इस कारण हुई की युद्ध में उनके साथ उनका भाई नहीं था। आपने आचार्य विद्यासागर जी महाराज के कहे गए वचनों का उल्लेख करते हुए कहा भाई का साथ जीवन में कभी नहीं छोड़ना चाहिए। भाई अगर असत्य मार्ग पर है तो उसे सत्य मार्ग पर लाना चाहिए। विभीषण के लाख प्रयास के बावजूद भी रावण सत्य मार्ग की ओर नहीं आया ।इसीलिए विभीषत ने रावण का साथ छोड़ा। मुनिराज ने कहा परिवार में भाई-भाई में बंटवारा होना सार्वभौमिक सत्य है। मगर पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे को आपसी सहमति से निपटाना चाहिए। एक पिता के चार पुत्र हैं तो पिता को अपने जीवित रहते हुए ही चारों पुत्रों में संपत्ति का बटवारा कर देना चाहिए। पैतृक संपत्ति को बंटवारे को लेकर आज हजारों प्रकरण न्यायालयों में विचाराधीन है। यह भी सत्य है कि पैतृक संपत्ति के बंटवारे, आपसी मनमुटाव एवं अन्य घटनाओं को लेकर कितने ही बैर विरोध चलते रहें अंत में संकट की घड़ी में भाई ही काम आएगा। श्रमण सागर जी महाराज ने प्रवचनों में आदर्श भाइयों के उदाहरण पुनः देते हुए कहा राम- लक्ष्मण, कृष्ण- बलदाऊ आदर्श भाई थे इनका सोच था कि ना मेरा है ना तेरा है यह संपत्ति नश्वर है।
