राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचन माला
मिली सजा को सजा न मानकर जीवन में आगे सजने का अवसर माने। मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 8 सितंबर। दिगंबर जैन आचार्य विद्यासागर जी महाराज के शिष्य, नवाचार्य समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती, विद्या कुल भूषण, महान तपस्वी, औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने धर्मनगरी राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचन माला में "सजा को सजा न माने" विषय पर मंगल प्रवचन करते हुए कहा सजा शब्द के दो अर्थ हैं दंड और सजावट। जीवन में हर क्षेत्र में टांग खींचने वाले मिल जाते हैं यह आए दिन होता है। टांग खींचने वालों के कार्य को हम सजा मानते हैं। वह सजा हमें जीवन में आगे सजाने की तैयारी मानना चाहिए। मुनिराज ने महा सती सीता का उदाहरण देते हुए कहा उन्हें 20 वर्ष का वनवास मिला। उस वनवास को उन्होंने शांतिपूर्वक सहन किया। सीता निर्दोष थी। महासती थी सजा के बाद वह महान बन गई। जैन दर्शन में हनुमान जी की माता सती अंजना का भी प्रसंग आया है उन्होंने 22 वर्ष तक पति से दूर रहकर अनेक कष्ट सहकर धैर्य पूर्वक जीवन यापन किया एक दिन वह आया कि उनके पति पवन्जय स्वयं उनसे मिलने आए और वह महान बन गई। आपने कहा जीवन में ऐसी घटनाएं आती हैं हम समझते हैं सजा मिल रही है जबकि उसे समय ने आगे अच्छा बनने का अवसर दिया है।
मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने युवक युवतियों जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं उनको मार्गदर्शन देते हुए कहा प्रयास मन से करो। सकारात्मक सोच रखो। नहीं कर पाऊंगा यह शब्द अपने मन से निकाल दो। आपने यह भी कहा प्रतियोगी परीक्षाओं में एक साथ तीन बार असफल होने पर भी हिम्मत न हारे यह मानकर चौथी बार परीक्षा की तैयारी करें कि चौथी बार की परीक्षा में मुझे सम्मानजनक सफलता मिलेगी और यह भी माने कि चौथी बार में जो सम्मानजनक सफलता मिली है वह तीन परीक्षाओं में असफल होने के बाद ही मिली है। आपने युवक युवतियों के अभिभावकों को भी मार्गदर्शन दिया कि अपने पुत्र पुत्री की रुचि जो
करने की उन्हें करने दीजिए। अपनी इच्छा उन पर न थोपे का दबाव उन पर न बनाये।इस प्रयास से युवक युवतियों में निराशा आती है। निराशा में युवक युवती अवसादग्रस्त हो जाते हैं या आत्म हत्या जैसे कदम उठा लेते हैं।भाग्य एवं पुरुषार्थ दोनों से काम बनता है सफलता नहीं मिली तो समझना मुझे भाग्य से अच्छी सफलता मिलेगी।
