उत्तम संयम धर्म पर मंगल प्रवचन
जो भगवान का सच्चा भक्त होता है वह अभावग्रस्त नहीं होता। मुनि श्रमण सागर जी
राघौगढ़ 21 सितंबर। जैन धर्म के पवित्र दस लक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म पर मंगल प्रवचन करते हुए इस सदी के महान संत आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, महा तपस्वी, औजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने कहा जैन दर्शन में संयम पालन के बड़े बारह उपाय बताए हैं इनमें छै इंद्री संयम एवं 6 प्राणी संयम हैं। अपने उदाहरण देते हुए कहा अपनी इंद्री को बस में न कर हाथी नकली हथिनी की ओर आकर्षित होता है और गड्ढे में गिर जाता है। रसना इंद्री के कारण मछली जाल में फंसकर प्राण त्याग देती है। चक्षु इंद्री से आकर्षित होकर कीड़े पतंगे दीपक के सामने जान गवा देते हैं। कर्ण इंद्री के वशी भूत होकर सांप, बीन बजाने पर सपेरों के बस में हो जाता है। नाक अथवा घ्राण इंद्री के बस में होकर भौरा फूल की सौगंध में आकर्षित होकर फूल में ही प्राण त्याग देता है। इन सब पांच इंद्रियों में सबसे अधिक पाप मन से होते हैं। आज संसारी प्राणी इन सभी 6 इंद्रियों के वासी भूत होकर कदम कदम पर पाप कर रहे हैं। मुनिराज ने संयम ग्रहण करने के पांच उपाय बताएं पहले स्वभाव से संयमी होते हैं इसके साक्षात उदाहरण आचार्य विद्यासागर जी महाराज हैं। दूसरे हैं प्रभाव से संयमी इसका उदाहरण देते हुए आपने बताया मैं स्वयं एवं मेरे साथ चातुर्मास कर रहे हैं मुनि ओंकार सागर जी इसके उदाहरण है। तीसरे प्रकार के होते हैं अभाव से संयमी। चौथी प्रकार के होते हैं दुर्भाव से संयमी, दुर्भाव से संयमी का उदाहरण देते हुए ब्रह्मगुलाल वहुरुपिया का उदाहरण देते हुए बताया राजा ने दुर्भावना से उसे वहुरुपया को कहा कि जैन मुनि का रूप बनाकर आओ और वह जैन मुनि दीक्षा लेकर आ गया। मुनि बनकर ब्रह्म गुलाल ने कहा अब यह रूप नहीं बदलेगा। मैंने मुनि दीक्षा ले ली है। मुनि मुद्रा ऐसी है इस मुद्रा पर अभिनय नहीं होता है। मुनि मुद्रा के दर्शन कर स्वर्ग का इंद्र शीश झुकाता है। चक्रवर्ती का मुख्य प्रसन्नता से खिल जाता है। अपने सभी को प्रेरणा दी की आज उत्तम संयम धर्म के दिन 12 प्रकार के संयम का पालन कर आत्म कल्याण करें। आपने कहा जो भगवान का भक्त होता है वह कभी अभावग्रस्त नहीं होता है कार्यक्रम संयोजक विकास कुमार जैन ने बताया है राघोगढ़ नगर में दस लक्षण पर्व पर दो मुनि राजों के पावन सानिध्य में धर्म की गंगा बह रही है। प्रतिदिन दोपहर 1:30 बजे से मुनि श्रमण सागर जी एवं मुनि ओंकार सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में जैन ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र का कंठस्थ वाचन दस-दस बालक बालिकाएं एवं महिलाएं कर रही हैं। जैन समाज राघोगढ़ के 10 वर्ष तक के बालक एवं बालिकाएं कंठस्थ तत्वार्थ की एक-एक गाथा सुनाते हैं। उल्लेखनीय है कि जैन धर्म में आचार्य उमा स्वामी जी द्वारा रचित तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ का वाचन बहुत कठिन होता है। इस ग्रंथ की सभी गाथाओं को कंठस्थ कर बालक बालिकाओं कंठस्थ सुनाकर ने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
