शीर्षक - महादेव : संहार से सृजन तक।
संहार से सृजन तक
धरती से गगन तक।
ऊष्मा से पवन तक,
भूमि से भवन तक।
सिंधु से सरिता तक,
अंधकार से सविता तक।
भजनों से कविता तक,
वर्तमान से भविता तक।।
आदि से अंत तक,
शून्य से अनंत तक।
जन्म से जीवंत तक,
युगों के पर्यन्त तक।।
हानि से लाभ तक,
जल से भाप तक।
शीत से ताप तक,
त्रिपुंड से छाप तक।।
कण कण में आप ही हो,
क्षण क्षण में आप ही हो।
हर समर्पण में आप ही हो,
हृदय के दर्पण में आप ही हो।।
मैंने रोकर पूछा महादेव से,
प्रभु मुझे इतना क्यों तोड़ रहे हो?
मैं तो आपका लाडला हूँ ना,
मेरी ही आत्मा को निचोड़ रहे हो।
कभी मग्न था मैं अपनी दुनिया में,
आज मुझे संकट में छोड़ रहे हो।
अपने भक्त को सताना गलत है,
सब देख कर भी मुह मोड़ रहे हो।।
महादेव मुस्कुराये! और धीरे से बोले,
तुमने मुझे हमेशा ध्यान करते देखा है।
कैलाश पर सृष्टि का उपकार करते देखा है,
कभी तांडव देखा, संहार करते देखा है।।
तू अब भी मेरा लाडला है,
मैंने आशीर्वाद से तुझे पाला है।
जब भी तेरे पुराने स्वरुप को तोडूंगा,
नई ऊर्जा देकर एकबार फिर से जोडूंगा।
तू क्यों भयभीत है काल से,
जब तू शरण में है महाकाल के।
बस इतनी बात तुझे समझ नहीं आई।
मैंने हर बार तेरी सुन्दर दुनिया बनाई ।
तू जब भी गिरा ठोकरें खाकर,
मैंने ही तुझे उठाया है।
तू जब भी पड़ा किसी संकट में,
मैंने ही तुझे बचाया है।।
मैं आज भी तेरे साथ में हूँ,
तेरी आस्था और विश्वास में हूँ।
तेरे मस्तिष्क और श्वास में हूँ,
तेरी भावना और आभास में हूँ।।
तुझे सोने सा चमकना भी है,
तेज अग्नि में तपना भी है।
मुझसे कहाँ कुछ छुपा है,
तेरे मन में कुछ सपना भी है।।
मैंने इष्ट देव को जान लिया है,
नियति की चाल पहचान लिया है।
विजय! सदैव अटल भरोसा रहेगा,
शिव - शक्ति को शास्वत मान लिया है।।
प्रस्तुति - विजय सिंह।
बलिया (उत्तर प्रदेश)
